आयुर्वेद के प्रमुख आचार्यों का परिचय
आयुर्वेद भारतीय ज्ञान-परंपरा का वह अमूल्य शास्त्र है जो केवल रोगोपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवन, दीर्घायु तथा शारीरिक-मानसिक संतुलन का समग्र विज्ञान है। शास्त्रों के अनुसार आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है।
चरक संहिता का प्रसिद्ध सूत्र—
“स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं च”
आयुर्वेद की मूल भावना को स्पष्ट करता है।
📚 Table of Contents
- आयुर्वेद की दैवीय उत्पत्ति और परंपरा
- महर्षि भारद्वाज और आयुर्वेद का अवतरण
- आत्रेय संप्रदाय और कायचिकित्सा
- महर्षि चरक
- आचार्य सुश्रुत
- आचार्य वाग्भट
- विशिष्ट शाखाओं के आचार्य
- मध्यकालीन आचार्य
- आधुनिक काल के आचार्य
- निष्कर्ष
1. आयुर्वेद की दैवीय उत्पत्ति और परंपरा
आयुर्वेद की परंपरा का आरंभ भगवान ब्रह्मा से माना जाता है। ब्रह्मा ने इस शास्त्र का उपदेश लोककल्याण हेतु किया। यह विद्या ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति को, दक्ष से अश्विनीकुमारों को तथा उनसे देवराज इंद्र को प्राप्त हुई।
अश्विनीकुमारों को आयुर्वेद का आदि आचार्य कहा गया है, जिनके चिकित्सीय चमत्कारों का वर्णन वैदिक साहित्य में मिलता है।
2. महर्षि भारद्वाज और आयुर्वेद का अवतरण
जब पृथ्वी पर रोगों के कारण ऋषियों के तप और वेदाध्ययन में बाधा आने लगी, तब महर्षि भारद्वाज को देवराज इंद्र के पास भेजा गया।
भारद्वाज ने इंद्र से आयुर्वेद का त्रि-स्कंध सिद्धांत प्राप्त किया—
- हेतु – रोग का कारण
- लिंग – रोग के लक्षण
- औषध – उपचार
3. आत्रेय संप्रदाय और कायचिकित्सा
महर्षि भारद्वाज की परंपरा को पुनर्वसु आत्रेय ने आगे बढ़ाया। उन्होंने कायचिकित्सा को व्यवस्थित एवं शास्त्रीय स्वरूप प्रदान किया।
उनके प्रमुख शिष्य अग्निवेश ने अग्निवेश तंत्र की रचना की, जो आगे चलकर चरक संहिता का आधार बना।
4. महर्षि चरक
महर्षि चरक ने अग्निवेश तंत्र का संशोधन कर चरक संहिता का निर्माण किया। यह ग्रंथ आयुर्वेद की कायचिकित्सा परंपरा का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
चरक ने आहार, विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और औषध निर्माण को वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान की।
5. आचार्य सुश्रुत
आचार्य सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। उन्होंने काशी के राजा दिवोदास धन्वन्तरि से शल्य विद्या का अध्ययन किया।
सुश्रुत संहिता में शल्य यंत्रों, शल्य क्रियाओं, प्रसूति चिकित्सा तथा अस्थि-नाड़ी विज्ञान का विस्तृत वर्णन है।
6. आचार्य वाग्भट
आचार्य वाग्भट ने अष्टांग हृदय और अष्टांग संग्रह की रचना कर चरक और सुश्रुत परंपराओं का समन्वय किया।
इन ग्रंथों को आयुर्वेद अध्ययन हेतु सर्वाधिक सरल और उपयोगी माना जाता है।
7. विशिष्ट शाखाओं के आचार्य
- महर्षि कश्यप – कौमारभृत्य (बाल रोग चिकित्सा)
- आचार्य जीवक – शल्य एवं बाल चिकित्सा
- शालिहोत्र – अश्व चिकित्सा
- पालकाप्य – हस्ति आयुर्वेद
8. मध्यकालीन आचार्य
- डल्हणाचार्य – सुश्रुत संहिता टीका
- माधवाचार्य – माधव निदान
- शार्ङ्गधर – नाड़ी विज्ञान
- भावमिश्र – भाव प्रकाश
9. आधुनिक काल के आचार्य
जादवजी त्रिकमजी आचार्य, प्रियव्रत शर्मा, ब्रह्मानंद त्रिपाठी जैसे विद्वानों ने आयुर्वेद को आधुनिक शोध और शिक्षा से जोड़ा।
निष्कर्ष
आयुर्वेद की आचार्य परंपरा यह सिद्ध करती है कि यह शास्त्र अनुभव, करुणा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समन्वय है। आज भी आयुर्वेद मानव जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाने में मार्गदर्शक है।
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https://orcid.org/0009-0007-7473-5279
