Ticker

10/recent/ticker-posts

षोडश संस्कारों में षष्ठ संस्कार : निष्क्रमण संस्कार | विधि, महत्व, शास्त्रीय आधार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

शिशु का प्रकृति से पहला परिचय कैसे होता है? 

षोडश संस्कारों में षष्ठ संस्कार : #निष्क्रमण संस्कार 



नमस्कार मित्रों आज हम निष्क्रमण संस्कार के महत्त्व को समझते हैं।

भारतीय संस्कृति में शिशु के जन्म के बाद उसके शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अनेक संस्कारों की व्यवस्था की गई है। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म तथा नामकरण संस्कार के पश्चात् षोडश संस्कारों का छठा संस्कार 'निष्क्रमण संस्कार' सम्पन्न किया जाता है।

'निष्क्रमण' शब्द का अर्थ है-घर से बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को पहली बार घर से बाहर निकालकर प्रकृति, सूर्य, चन्द्रमा, शुद्ध वायु तथा पंचमहाभूतों के सान्निध्य में ले जाया जाता है। यह केवल बाहर घूमाने की परम्परा नहीं, बल्कि शिशु के जीवन का प्रकृति से पहला औपचारिक परिचय है।

भारतीय ऋषियों का मानना था कि मनुष्य का शरीर पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से निर्मित है। अतः जीवन के प्रारम्भ में ही इन प्राकृतिक शक्तियों से शिशु का शुभ परिचय कराया जाना चाहिए, जिससे उसका शरीर, मन और चेतना प्रकृति के साथ संतुलित होकर विकसित हो सके।

👉🏻 निष्क्रमण संस्कार कब किया जाता है?

धर्मशास्त्रों में सामान्यतः जन्म के तीसरे अथवा चौथे महीने में इस संस्कार का विधान किया गया है। महर्षि मनु ने भी मनुस्मृति में कहा है-

"चतुर्थे मासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात्।" (मनुस्मृति २.३४)

अर्थात् शिशु के जन्म के चौथे महीने में उसे पहली बार घर से बाहर ले जाकर निष्क्रमण संस्कार करना चाहिए।

इस समय तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण को स्वीकार करने योग्य बनने लगता है। इसलिए यह समय सबसे उपयुक्त माना गया है।

👉🏻 निष्क्रमण संस्कार का उद्देश्य

इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य शिशु के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, मानसिक विकास तथा प्रकृति के साथ उसके सहज सम्बन्ध की स्थापना करना है। शास्त्रों में कहा गया है-

"निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभिः।"

अर्थात् मनीषियों ने निष्क्रमण संस्कार को आयुवृद्धि का कारण माना है।

👉🏻 वैज्ञानिक दृष्टि से निष्क्रमण संस्कार

अनेक लोग संस्कारों को केवल धार्मिक कर्मकाण्ड मानते हैं, किन्तु यदि गहराई से विचार करें तो निष्क्रमण संस्कार के पीछे अत्यन्त वैज्ञानिक सोच दिखाई देती है।

जन्म के बाद प्रारम्भिक तीन महीनों तक शिशु का शरीर अत्यन्त कोमल होता है। उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पूर्ण रूप से विकसित नहीं होती। इसलिए उसे घर के सुरक्षित वातावरण में रखा जाता है।

तीन-चार महीने बाद शिशु धीरे-धीरे बाहरी वातावरण के अनुकूल होने लगता है। हल्की धूप, स्वच्छ वायु और प्राकृतिक प्रकाश उसके शरीर के लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं। आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी शिशु के उचित विकास के लिए नियंत्रित रूप से प्राकृतिक वातावरण के सम्पर्क को उपयोगी मानता है।

👉🏻 पंचमहाभूतों से प्रथम परिचय

भारतीय दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि पंचमहाभूतों से निर्मित है और मनुष्य का शरीर भी इन्हीं तत्वों का संघटन है।

निष्क्रमण संस्कार के माध्यम से शिशु का क्रमशः -

☀️ सूर्य के प्रकाश से,

🌬️ शुद्ध वायु से,

🌍 पृथ्वी के स्पर्श से,

💧 जीवनदायिनी जलशक्ति से,

🌌 तथा खुले आकाश से परिचय कराया जाता है।

यह केवल प्रतीकात्मक कार्य नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और जीवन के मूल स्रोतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की शिक्षा भी है।

👉🏻 निष्क्रमण संस्कार की विधि

शुभ तिथि और मुहूर्त का चयन कर शिशु को स्नान कराया जाता है तथा स्वच्छ वस्त्र पहनाए जाते हैं।

इसके पश्चात् माता-पिता अथवा परिवार के बड़े सदस्य शिशु को घर से बाहर लेकर जाते हैं। परम्परा के अनुसार पहले सूर्यदेव के दर्शन कराए जाते हैं तथा उसके उत्तम स्वास्थ्य, तेज, दीर्घायु और यशस्वी जीवन की प्रार्थना की जाती है।

सूर्यदर्शन के समय वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है-

शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ।

शं ते सूर्य आ तपतु शं वातो ते हृदे।

शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः॥

भावार्थ : हे बालक! आकाश और पृथ्वी तुम्हारे लिए कल्याणकारी हों। सूर्य तुम्हें तेज और आरोग्य प्रदान करें। शुद्ध वायु तुम्हारे जीवन में प्राणशक्ति का संचार करे तथा दिव्य जल तुम्हें स्वस्थ और पवित्र बनाए।

इसके पश्चात् कुलदेवता एवं इष्टदेव का पूजन किया जाता है। कई परम्पराओं में शिशु को कुछ क्षणों के लिए पवित्र भूमि का स्पर्श भी कराया जाता है, जो पृथ्वी माता के प्रति सम्मान और स्थिर जीवन का प्रतीक माना गया है।

संध्या समय अस्त होते सूर्य को प्रणाम कर कृतज्ञता व्यक्त की जाती है तथा रात्रि में अवसर मिलने पर शिशु को चन्द्रमा के दर्शन भी कराए जाते हैं।

👉🏻 सूर्य और चन्द्र दर्शन का महत्व

भारतीय परम्परा में सूर्य केवल प्रकाश के देवता नहीं, बल्कि जीवन, ऊर्जा, तेज और आरोग्य के प्रतीक हैं। इसलिए शिशु को सूर्यदर्शन कराकर उसके जीवन में ओज, उत्साह और स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

इसी प्रकार चन्द्रमा शीतलता, सौम्यता और मानसिक संतुलन के प्रतीक हैं। चन्द्रदर्शन के माध्यम से यह मंगलकामना की जाती है कि शिशु का स्वभाव शांत, मधुर और संतुलित बने।

👉🏻 वर्तमान समय में निष्क्रमण संस्कार

आज अधिकांश परिवार इस संस्कार के शास्त्रीय स्वरूप से परिचित नहीं हैं। सामान्यतः बच्चे को पहली बार मंदिर ले जाना, बाहर घुमाने ले जाना अथवा किसी तीर्थ के दर्शन कराना ही निष्क्रमण संस्कार मान लिया जाता है।

आधुनिक जीवनशैली, अस्पतालों में प्रसव, छोटे परिवार तथा व्यस्त दिनचर्या के कारण इसकी वैदिक विधियाँ बहुत कम दिखाई देती हैं। फिर भी इसकी मूल भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

आज बाल रोग विशेषज्ञ भी शिशु को उचित समय पर स्वच्छ वातावरण, हल्की धूप, ताजी हवा और प्राकृतिक परिवेश से परिचित कराने की सलाह देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हमारे ऋषियों द्वारा स्थापित इस संस्कार के पीछे गहन अनुभव और वैज्ञानिक दृष्टि विद्यमान थी।

यदि आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप इसकी मूल भावना को अपनाया जाए तो निष्क्रमण संस्कार आज भी शिशु के सर्वांगीण विकास का एक अत्यन्त उपयोगी माध्यम बन सकता है।

अन्ततः निष्क्रमण संस्कार हमें यह सिखाता है कि मनुष्य केवल परिवार का सदस्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति का भी अभिन्न अंग है। जीवन की शुभ शुरुआत प्रकृति के आशीर्वाद, सूर्य के तेज, चन्द्रमा की शीतलता और पंचमहाभूतों के संरक्षण के साथ हो - यही इस संस्कार का मूल संदेश है।

क्रमशः अगले लेख में षोडश संस्कारों के सप्तम संस्कार "अन्नप्राशन संस्कार" की चर्चा करेंगे।

© EduTech Sanskrit

Niṣkramaṇa Saṃskāra marks an infant's first sacred introduction to nature, symbolizing harmony with the cosmic order.16 Sanskar

#NishkramanaSamskara

#16Sanskar

#VedicTradition

#HinduCulture

#IndianKnowledgeSystem

#edutechsanskrit

#vipuljadav